महिला सशक्तिकरण के लिए याद किए जाएंगे नीतीश
Nitish Will Be Remembered for Women’s Empowerment

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से डेढ़ साल पहले तक प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी भी कमजोर पड़ने लगी थी। इसके कई कारण थे—खराब शासनकाल, नौकरशाहों पर कमजोर पकड़ और सबसे महत्वपूर्ण उनका स्वास्थ्य।
खैर, राजनीति में संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं। तमाम परिस्थितियों के बावजूद नीतीश कुमार एक सर्वमान्य नेता बने रहे। चुनाव के दौरान नारा गूंजा—‘पच्चीस से तीस, फिर से नीतीश’। लेकिन विडंबना देखिए, यह नारा भी भविष्य की सच्चाई को नहीं बदल सका। पांच साल तो दूर, वे एक साल भी सत्ता के शीर्ष पर टिक नहीं पाए। महज चार महीनों में ही उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। साफ है कि अब वे कुछ ही दिनों के लिए मुख्यमंत्री पद पर रहेंगे।

अब बिहार की सत्ता नए नेतृत्व के इशारों पर चलेगी। कई लोगों के लिए नीतीश का यह इस्तीफा समाजवाद के लिए ‘ताबूत में आखिरी कील’ जैसा प्रतीत हो सकता है। उनके कार्यकाल की खूबियों और खामियों पर मुख्यधारा और सोशल मीडिया दोनों ही जगहों पर भरपूर चर्चा हो चुकी है। अब जब नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से एक नए मोड़ पर खड़े हैं, तो उनके शासन का मूल्यांकन स्वाभाविक है। कोई उन्हें ‘सुशासन बाबू’ कहेगा, तो कोई यह आरोप लगाएगा कि उनके दौर में बिहार मजदूरों की आपूर्ति करने वाला राज्य बन गया। दोनों ही दृष्टिकोण अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं।
लेकिन अगर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि की बात की जाए, तो मेरा मानना है कि इतिहास उन्हें महिला सशक्तिकरण के लिए याद रखेगा।

जैसे तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री कामराज को मिड-डे मील योजना के जरिए शिक्षा में क्रांति लाने के लिए याद किया जाता है, वैसे ही नीतीश कुमार को महिलाओं को सशक्त बनाने के उनके प्रयासों के लिए याद किया जाएगा।
सशक्तिकरण केवल एक आयाम से संभव नहीं होता। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक—तीनों क्षेत्रों में हस्तक्षेप जरूरी होता है। नीतीश कुमार ने इन तीनों स्तरों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की।
साइकिल से स्कूल जाती लड़कियां उस सामाजिक बदलाव की प्रतीक बन गईं, जहां कभी उनके लिए जन्म लेना ही उपलब्धि माना जाता था। शिक्षा के लिए दी गई आर्थिक सहायता ने न केवल साक्षरता दर बढ़ाई, बल्कि समाज में उनकी आवाज़ को भी महत्व दिलाया। घर से लेकर पंचायत तक, उनके विचारों को जगह मिलने लगी।

नीतीश कुमार ने यह भी समझा कि केवल शिक्षा से सशक्तिकरण अधूरा है। राजनीतिक भागीदारी उतनी ही जरूरी है। पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण ने इस दिशा में बड़ा बदलाव किया। जो महिलाएं कभी घर की दहलीज तक सीमित थीं, वे अब पंचायत और जिला स्तर पर निर्णय लेने लगीं। वे बैठकों में शामिल हुईं, अधिकारियों से संवाद किया और नेतृत्व की भूमिका निभाई। हालांकि, यह राजनीतिक सशक्तिकरण अभी भी सीमित वर्ग तक ही केंद्रित रहा। इसका एक कारण यह भी था कि कई महिलाएं चुनाव में परिवार के पुरुषों के समर्थन पर निर्भर थीं। वैसे भी राजनीतिक अवसर सीमित होते हैं।
इसलिए आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदम और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाओं को आरक्षण देने से उनकी भागीदारी बढ़ी। साथ ही, विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से उन महिलाओं को भी आगे बढ़ने का अवसर मिला, जिन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी।

शिक्षा का ही परिणाम है कि अब लड़कियां रोजगार की तलाश में घर से बाहर निकल रही हैं। वे देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर काम कर रही हैं। डॉक्टर और इंजीनियर जैसे पारंपरिक पेशों के साथ-साथ डिजाइनर और इन्फ्लूएंसर जैसे नए क्षेत्रों में भी बिहार की बेटियां अपनी पहचान बना रही हैं।
भविष्य में जब भी नीतीश कुमार के बिहार की तस्वीर खींची जाएगी, तो उसमें साइकिल पर स्कूल जाती लड़कियां जरूर दिखाई देंगी। कॉर्पोरेट दफ्तरों में आत्मविश्वास से अंग्रेज़ी बोलती युवतियां होंगी, जिन्हें देखकर लोग हैरानी से कहेंगे—“तुम बिहार की नहीं लगती।” वहीं किसी दूरदराज के गांव में एक शिक्षिका दूसरी लड़कियों को बड़े सपने देखना सिखा रही होगी। कहीं कोई महिला नेत्री किसी दूसरी महिला को यह समझा रही होगी कि उसके पंचायत क्षेत्र की समस्याओं को कैसे दूर किया जाए।
यही वह बदलाव है, जो यह साबित करता है कि तमाम सामाजिक समीकरणों के बावजूद नीतीश कुमार के समर्थन में एक ऐसा वर्ग खड़ा हुआ, जिसे न भाजपा पूरी तरह अपने पक्ष में कर पाई और न ही राजद।