प्रकृति को कैनवास में रंग भरता मानवीय ब्रश : राजगीर
Rajgir: The Human Brush That Colors Nature’s Canvas

प्रकृति को कैनवास में रंग भरता मानवीय ब्रश : राजगीर
राजगीर, जहां प्राकृतिक सुंदरता को मानवीय प्रयास और निखार रही है
इस बार की राजगीर यात्रा पिछली बार से अलग थी। पिछले दो बार बिना किसी योजना के पहुँचे थे। इस बार त्वरित ही सही लेकिन एक योजना थी। अहले सुबह 6 बजे ट्रेन जब राजगीर के प्लेटफार्म पर लग रही थी, खिड़कियों से ठंड़ी हवा ट्रेन में दाखिल हो रही थी। ट्रेन से कदम बाहर रखते हीं पहाडों के पिछे बिखरी सुनहरी रोशनी बचपन के ड्राइंग क्लास की याद दिला दी। जहां सूर्य हमेशा पहाड़ों के पिछे से ही निकलते थे। बहुत दिनों बाद ठंड़ी हवा की सिहरन में सूर्योदय देख कर बोझिल मन स्थिर हो रहा था।

पहली बार राजगीर घूमने आया था तो यहां तांगा खूब चलता था। इस बार तांगे की जगह टोटो ने ले ली थी। प्लान था ही कि ब्रह्म कुंड मे सबसे पहले नहा लेना है इसके बाद आगे का सोचा जाएगा। टोटो से हमलोग ब्रह्म कुंड पहुँच गए। फिर नित्यकर्म से निपट कर चाय पीने की योजना बनी। चाय की दुकान पहँचे। चाय ली गई। नहाने की जगह पता होने के बाबजूद भी अनायास ही बात करने के लिए हमने चाचा से नहाने की जगह पूछ ली। बिना किसी लाग लपेट के चाचा ने सीधे पूछा कि हिंदू हो कि मुस्लिम। शायद मेरे हुलिए से उनको धोखा हुआ। थोड़ा अचरज भी हुआ। नहाने के लिए हिन्दू मुस्लिम से क्या लेना देना? खैर, हमने हिंदू बताया। उन्होंने बताया कि ब्रह्म कुंड चले जाइए। हमारी योजना भी वहीं की थी।
चाचा के सवाल ने मन में एक प्रश्न भी छोड़ दिया था। अगर मुस्लिम होते तो क्या होता? लगे हाथ हमने पूछ ही लिया। चाचा ने सपाट भाव से कहा कि मखदूम कुंड। मैं राजगीर तीसरी बार पहुंचा था। पिछली दो यात्रा में राजगीर घूमा भी खूब था। छोटा शहर है तो गुमान भी था कि सब देख चुका हूँ। पर ये नाम कभी नहीं सुना। उत्सुकता हुई, हमने उसके बारे में पूछा तो पता चला कि मखदूम शाह नाम के पीर बाबा नालंदा के इलाके में बड़े मशहूर हैं। उनके नाम पर ही यह कुंड और एक मखदूमपुर कस्बा है।

हमने ब्रह्मकुंड में स्नान किया गया। ब्रह्मकुंड परिसर में सात ऋषियों के नाम पर जल धारा हैं। इसका अलावा एक मेन कुंड हैं। कुछ लोग इसे दैविये शक्ति मानते हैं। हालांकि भूगोल का विद्यार्थी होने के नाते हम ऐसे गर्म जल के स्त्रोतों से परिचित थे। अमेरिका का यलोस्टोन नेशनल पार्क दुनियाभर में इसके लिए ही मशहुर हैं। दरअसल राजगीर की पहाड़ी में फॉस्फोरस प्रचुर मात्रा में पाएं जाते हैं। इसके वजह से यहां गर्म जल के कई स्त्रोत हैं। मखदूम कुंड भी गर्म जल वाला ही है। 2018 की अपेक्षा इस बार कुंड का परिसर काफी साफ था। जगह-जगह गीले कपड़े नहीं फैले थे। तब तो मेन कुंड में पैर रखते ही मन भीन-भीन हो गया था कि पूरा कुंड ही कपड़ों से भरा पड़ा था। इस बार स्थिति ऐसी नहीं थी।
स्नान के बाद राजगीर वाइल्डलाइफ सफारी के लिए निकल गए। टिकट की मारामारी से परिचित थे। इसलिए सफारी में तैनात एक साथी से टिकट की व्यवस्था की बात हो गई थी। मित्र की परम इच्छा थी कि पहले ग्लास ब्रिज देख ली जाये। वैसे भी ग्लास ब्रिज राजगीर की पहचान गई है। पहाड़ की ऊंचाई पर बने ग्लास ब्रिज से घाटी का दृश्य नयनसुख तो देता ही है। वैसे भी प्रकृति तो सुंदर ही है। मुझे एरोफोबिया है तो नीचे देखने पर पैर में एक अलग ही तरह की कंपन होती है। मुझे सबसे अधिक खुशी इस बात से हुई कि बनने के 4 बाद भी यह पूरी तरह से व्यवस्थित है। आमतौर पर यह धारणा होती है कि सरकारी व्यवस्था अधिक दिनों तक टिक नहीं पाती। इसके उलट पूरा वाइल्डलाइफ सफारी वेल मेंटेंड है।

इसी परिसर में एक सस्पेंशन ब्रिज भी है। ग्लास ब्रिज से कोई 150/200 मीटर की दूरी पर। यह ब्रिज लकड़ी का बना है। जो चलने पर हिलता है। इसका हिलना ही एक रोमांच देता है। परिसर में एडवेंचर के लिए जिप लाइन, जिप साईकिल, राइफल शूटिंग, आर्चरी, रॉक क्लाइंबिंग जैसे खेल भी हैं। यह सब बिहार के राजगीर में है। किसी से कहो तो लोग यकीन नहीं करते। पहले तो मानते नहीं है। बहुत कहने पर अगर मान भी लें तो कहते हैं कि अच्छी स्थिति में नहीं होगी। लेकिन यह सब सुचारू है, सुरक्षित है।
नेचर सफारी के बाद हम जू सफारी में दाखिल हुए। यहां हमें सफारी के लिए हीं डिजाइन गाड़ी से घुमाया गया। हमारी सफारी की यात्रा शुरू हुई हिरण ब्लॉक से। खुले जंगल में हिरण को दौड़ते, कुदते, फांदते देखना आनंदित करता है। चीतल, ब्लैकबक, सांबर, मुन्तजाक और हॉग डियर की प्रजातियां एक साथ देखने को मिल जाती हैं।

इसके बाद हम भालू के ब्लॉक में गए। जहां सुंदरी हमारे होने से भी बेपरवाह अपने में मगन थी। फिर हम दाखिल हुए कैट फैमिली के सबसे शर्मीले मेंबर के आंगन में। तेंदुआ। वैसे तो ये शर्मीले होते हैं, लेकिन बहुत शातिर। एक बार जंगल में निकल गए तो आपकी किस्मत ही है जो आप देख सकें। जी, हम भी साधारण किस्मत वाले लोग ही थे। हमें भी जनाब ने दर्शन नहीं दिया।
तेन्दुआ न देख पाने के अफसोस के साथ हम बाघ के एरिया में पहुँचे। जंगल में गाड़ी घूमनी शुरू हुई। ‘देवी जी’ एक जलाशय के पास दोपहर की मीठी नींद ले रहीं थी। उनके आलस का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वो करवट भी आधी ही ले रहीं थी। बाध देख लेने की खुशी के साथ हम राजा के इलाके में दाखिल हुए। राजा साहब को आज वैक्सीन लगाई गई थी। सफारी में कार्यरत साथी ने बताया। इस वजह से गेट पर ही मिल गए। मन में खुशी हुई कि राजा के दर्शन हो गए। अन्यथा राजा हैं मन हुआ तो मिले नहीं तो नहीं मिले। घंटो इंतजार के बाद भी।
इस तरह दिन का एक एक पहर प्रकृति के कैनवस पर मानवीय सृजन को निहारते बित गया।