यात्रा - 2026-04-01

राजगीर यात्रा की शुरुआत ‘पान-प्रसाद’ से

Rajgir Trip Begins with Paan Prasad

Rajgir Trip Begins with Paan Prasad
तीसरी बार राजगीर की यात्रा पर था। इस बार जाने की कोई ठोस वजह नहीं थी- बस एक तरह का एस्केप का पार्ट था। अपने बोझिल दिनचर्या से। मन कहीं दूर भाग जाना चाहता था। अकेले निकलने की हिम्मत नहीं जुटी, तो एक मित्र से बात हुई। बातों-बातों में योजना बनी और हम चल पड़े-राजगीर की ओर। शाम के 8:15 बजे, बनारस स्टेशन से बुद्धपूर्णिमा एक्सप्रेस में सवार हुए। आम तौर बिहार जाने वाली भीड़ भरी ट्रेन से विपरीत इस ट्रेन में सीट भर हीं लोग थे। ट्रेन जैसे ही दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन को पार कर आगे बढ़ी, यात्रा ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। एक महिला, गोद में बच्चे को लिए, मेरे बगल से गुज़री। उसके गुज़रते ही मेरे शरीर पर कुछ तरल-सा आ गिरा। क्षणभर को लगा, जैसे बच्चे ने शरारत में अपने मुंह से कुछ थूक दिया हो। संदेह और असहजता के बीच मैं वॉश बेसिन की ओर बढ़ा।
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वहाँ दृश्य कुछ और ही था। महिला गुस्से से भरी हुई थी। बार-बार एक ही बात दोहरा रही थी। किसी ने उसके सिर पर गुटखा थूक दिया है। उसके और बच्चे के सिर पर गुटखे के छींटे साफ़ दिखाई दे रहे थे। मैंने भी अपने कपड़ों की ओर देखा। मेरा भी वही हाल था। अब स्वाभाविक था कि भीतर का नागरिक जाग उठे। मैं अपनी सीट पर लौटा और चार-छह सधे हुए तत्सम शब्दों के साथ ग़ुटकेबाज की तलाश शुरू की। धीरे-धीरे और लोग भी जुड़ते गए। सबने मिलकर अपने-अपने शब्दकोष का योगदान दिया। माहौल में आक्रोश भी था और थोड़ी-सी नाटकीयता भी।
Rajgir Trip Begins with Paan Prasad
इसी बीच, हमारे ठीक बगल वाले कंपार्टमेंट की साइड अपर सीट पर लेटे एक सज्जन चुपचाप यह दृश्य देख रहे थे-जैसे किसी नाटक के दर्शक हों। जब कहीं से कोई ऊहापोह नहीं दिखी तो धमकी देने की नौबत आई। एक सज्जन ने मुस्तैदी दिखाते हुए 139 डायल करने के लिए फोन निकला लिए। दर्शक बने सज्जन ने अपना मौन तोड़ा। हाथ जोड़कर उन्होंने विनम्रता से शिकायत न करने का अनुरोध किया। उम्र का लिहाज़ किया गया। हालांकि, सामाजिक सौंदर्य को बनाए रखना भी जरूरी था। इस लिहाज से कुछ औपचारिक तत्सम शब्दों से अपना प्रेम बरसाया। अंततः मामला रफ़ा-दफ़ा हुआ।
Rajgir Trip Begins with Paan Prasad
अब बारी उनकी सफाई सुनने की थी। उन्होंने बताया कि वे महावीर जयंती के अवसर पर जहानाबाद के पास किसी गाँव में ध्वज-पताका फहराने जा रहे हैं। फिर थोड़ी झेंप के साथ असली बात सामने आई। हमारे शरीर पर पड़ा मुखामृत गुटखा नहीं था। सज्जन बनारस से लौट रहे थे। इस क्रम में पान घुलाने का मोह वे त्याग नहीं पाए थे। पान घुलाने में इतने तल्लीन थे कि अचानक आई एक छींक ने सारी मर्यादाएँ भंग कर दीं। उस एक छींक ने पान की पीक को एक अनचाहे ‘प्रसाद’ में बदल दिया, जो हम तीनों पर समान रूप से अर्पित हो गया। इस अप्रत्याशित ‘अभिषेक’ के साथ हमारी राजगीर यात्रा का विधिवत शुभारंभ हुआ। #TravelDiaries #IndianRailways #UnexpectedJourney #Rajgir